
कभी किसी पुरानी, बिखरी हुई इमारत को देखा है—जिसके ख़्वाबों की छत कब की ज़मीन पर आ गिरी हो, जिसके आँगन में अब केवल ख़ामोशी बसती हो?
अजीब बात है न?
एक नई इमारत को देखकर हम उसकी सुंदरता के पुल बाँधते हैं। उसकी चमकती दीवारें, साफ़ खिड़कियाँ और सजे हुए दरवाज़े हमारी आँखों को भाते हैं।
लेकिन फिर वही आँखें किसी टूटे हुए छज्जे पर ठहर जाती हैं—जिसकी दीवारों पर शैवाल के जंगल उग आए हैं, जिसकी खिड़कियाँ कब की टूट चुकी हैं और जिसे शायद सदियों से किसी ने छुआ तक नहीं।
फिर भी हम उसे देखते हैं, ठहरते हैं और न जाने क्यों उसकी ओर खिंचे चले जाते हैं।
आख़िर ऐसा क्यों है?
एक नई इमारत हमें बताती है कि उसे किसने बनाया।
लेकिन एक उजड़ी हुई इमारत हमसे पूछती है—यहाँ कभी कौन रहता था?
इन दीवारों के बीच कितनी हँसी गूँजी होगी? कितनी आँखों ने यहाँ अपने सपने सँजोए होंगे? कितनी शामें किसी के लौटने की प्रतीक्षा में ढली होंगी?
समय ने इमारत को तोड़ दिया, मगर उसकी कहानी को पूरी तरह मिटा नहीं पाया।
और शायद हम उसी बची हुई कहानी की ओर खिंचते हैं।
शायद सच्ची मोहब्बत भी कुछ ऐसी ही होती है।
किसी से प्रेम करना केवल उसके सुंदर चेहरे, मुस्कान या साथ बिताए सुखद दिनों से प्रेम करना नहीं है।
सच्ची मोहब्बत तो तब दिखाई देती है, जब सामने वाले के भीतर कुछ टूटने लगे—और हम फिर भी उसके पास ठहरें।
जब चेहरे की चमक फीकी पड़ जाए, जब शब्द कम हो जाएँ, जब जीवन अपनी सारी सुंदरता समेटकर किसी को ख़ामोशी के हवाले कर दे—और फिर भी कोई कहे,
“तुम अब भी उतने ही अपने हो।”
शायद मोहब्बत किसी के संपूर्ण होने से नहीं, बल्कि उसके बिखर जाने के बाद भी उसे अपना मान लेने से पूरी होती है।
किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है कि…
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
हम समय को देख नहीं सकते।
लेकिन किसी दीवार की दरार, पत्थरों पर जमी काई और टूटे हुए दरवाज़े को देखकर हम समझ सकते हैं कि कितने मौसम वहाँ से गुज़र चुके हैं।
कभी किसी ने उन दीवारों को अपने हाथों से बनाया था।
फिर लोग चले गए।
पीढ़ियाँ बदल गईं।
मगर दीवारें रह गईं—अपने भीतर बीते हुए कल की साँस सँभाले हुए।
शायद इसीलिए खंडहर हमें अपनी ओर बुलाते हैं।
वे हमें याद दिलाते हैं कि सुंदरता का अर्थ हमेशा नया, चमकदार और संपूर्ण होना नहीं है।
कभी-कभी दरारों में भी एक पूरी दास्तान छिपी होती है।
और शायद हम टूटी हुई चीज़ों को इसलिए सुंदर पाते हैं—
क्योंकि उनमें बीते हुए समय की ख़ुशबू होती है, बिछड़ जाने का दर्द होता है, और फिर भी... किसी के कभी यहाँ होने की एक ख़ूबसूरत गवाही बची होती है।
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